Fri, August 14
सोलन
June 25,2020
क्यों और किन प्रस्तिथियों में लगी थी इमरजेंसी ?

 

Article by : MukulDev Rakshpati

 

सोलन जिस दौर से आज हम भारतवासी गुजर रहे हैं, उसे सदियों तक भुलाया नहीं जा सकेगा और आने वाली पुश्तें इस समय को इतिहास व किस्से कहानियों में सुनते-सुनाते और पढ़ते-पढ़ाते रहेंगे। ये एक ऐसा आपातकाल रहा, जिसमें आधे मार्च से लेकर मई व जून तक लोग-बाग अपने-अपने घरों में बंद रहे। लेकिन ये आपातकाल और इसका कफ्र्यू कानून-व्यवस्था के लिहाज से नहीं, बल्कि महामारी के कारण लगा, जिसका उद्देश्य लोगों को दबाना व प्रताडि़त करना नहीं, उन्हें स्वास्थ्य सुरक्षा देना था। हम अपने पाठकों को बता दें कि आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व भी भारत में एक इमरजेंसी लगी थी और उस आपातकाल को देश का काला अध्याय कहा जाता है।

वो 25 जून 1975 की तारीख थी, जब तत्तकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की। और इसी घोषणा के साथ दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी, उनके मौलिक अधिकार और भारत के प्रजातंत्र पर भी ग्रहण लग गया। भारत देश पर लगा यह ग्रहण जल्द समाप्त नहीं हुआ, जो 19 महीनो तक चला और इस दौरान देश में जो कुछ हुआ, उसके कई किस्से व कहानियां हैं।

हम उस तरफ नहीं जाएंगे, लाइव टाइम्स टीवी के माध्यम से सिर्फ बताने का प्रयास करेंगे कि 1975 के दौरान क्यों और कैसै व किन परिस्थितियों में आपातकाल घोषित किया गया था।

25 जून 1975 की रात को प्रधानमंत्री आवास के गलियारे में गृह राज्य मंत्री ओम मेहता की मुलाक़ात सिद्धार्थ शंकर रे से हुई, गृह राज्य मंत्री ने रे को बताया की सभी अख़बारों की बिजली काट दी गयी है।  रे कुछ समय पहले तक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ थे और इमरजेंसी क्यों और कैसे लगाई जाएगी इस बारे में उन्हें सलाह दे रहे थे उन्होंने जब गृह राज्य मंत्री के मुख से यह सुना तो वो भी हक्के बक्के रह गए। अगले दिन कुछ ही अख़बार छपे और विपक्ष के बड़े नेता जय प्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया।

26  जून 1975 को पुरे देश को रेडियो पर प्रधानमंत्री का सम्बोधन सुनंने को मिला

इमरजेंसी लग चुकी थी , एक काले अध्याय की शुरुआत भारत के इतिहास में हो चुकी थी और इसके बाद यह काला अध्याय 19  महीने तक चला इसमें क्या क्या हुआ यह सबने सुना है, सबको पता भी है.  लेकिन आखिर आपातकाल की घोषणा की क्यों गयी ? क्या आवश्यकता पड़ी देश की "आयरन लेडी  " को इमरजेंसी लगाने की। सरकार ने तो आतंरिक अस्थिरता का हवाला दे कर इमरजेंसी लगाई, कहा की हड़तालों और प्रदर्शनों के कारन देश में विकास की गति रुक रही है लेकिन उच्चतम न्यालय के वकील  प्रशांत भूषण अपनी किताब "case that shook India  " में इसके बारे में अलग गए रखते हैं इस किताब में वो इस आपातकाल के कारण के बारे में विस्तार से बताते हैं।  यह किताब उस केस के बारे में जिसके बाद भारत में इमरजेंसी की घोषणा हुई थी।  क्या था वो केस, क्या हुआ था ऐसा की लोगों में इतना लोकप्रिय होने के बाद भी इंदिरा गाँधी जैसे दिग्गज नेत्री को आपातकाल लगाना पड़ा ?

बात है साल 1969 की , इंदिरा गाँधी का कद कांग्रेस में इतना बढ़ गया था की कांग्रेस के खुद दो धड़े बन गए थे और 1969 का चुनाव कांग्रेस के दोनों धड़ो ने लड़ा , कांग्रेस R और कांग्रेस O.  कांग्रेस R  की नेता खुद इंदिरा गाँधी थीं।  इंदिरा गाँधी ने यह इलेक्शन वहां से लड़ा जो जगह कांग्रेस का गढ़ माना जाता है - राइ बरेली।  इंदिरा गाँधी की पकड़ कितनी थी आप इस बात से समझ सकते हैं की सभी विपक्षी दल, जिसमे कांग्रेस O भी थी एकजुट हो गए।  उन्होंने रायबरेली से अपना कैंडिडेट खड़ा किया राज नारायण को। हालाँकि राज नारायण अपनी जीत पर आश्वस्त थे लेकिन इंदिरा गाँधी ने  एक बड़े मार्जिन से यहाँ पर जीत दर्ज की।  राज नारायण को लगा यहाँ कुछ घपला हुआ है। राज नारायण ने एक conspiracy theory बनाई की chemically treated बैलेटपेपर पर वोटिंग हुई और इस थ्योरी को लेकर वो उस समय के बड़े वकील और प्रशांत भूषण के पिता वकील शांति भूषण से मिले।

शांति भूषण इस बात पर ज़ाहिर सी बात है सहमत  नहीं हुए , लेकिन उन्होंने केस लड़ा , किस आधार पर?

इलेक्शन में corrupt electroral practices  , जैसे की सरकारी मुलाज़िमों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना उसमे से पहला था उसके बाद इलेक्शन में जितने की अनुमति है उस से ज़्यादा का खर्चा करने का इलज़ाम दूसरा था और तीसरा और सब से दिलचस्प था इलेक्शन में धार्मिक प्रतीको का इस्तेमाल , कैसे? उस समय कांग्रेस का election symbol गाय और बछड़ा था , शांति भूषण का तर्क था की गाय  हिन्दुओं के लिए एक धर्म का प्रतिक है इसलिए इसका इस्तेमाल वर्जित होना चाहिए।  अप्रैल 24, 1962  को अलाहबाद हाई कोर्ट में यह पेटिशन दायर किया गया।  काफी पॉइंट्स कोर्ट के द्वारा और काफी खुद पिटीशनर्स के द्वारा निरस्त कर दिए गए लेकिन यशपाल कपूर की कड़ी ज़रा फ़स गयी।  यशपाल कपूर उस इलेक्शन में इंदिरा गाँधी के इलेक्शन एजेंट थे लेकिन एक सरकारी मुलाज़िम कभी भी इलेक्शन एजेंट नहीं बन सकता, तर्क वितर्क हुए लकिन कोई बात नहीं निकली फिर आयी वो घडी जब पहली बार देश को प्रधानमंत्री को खुद कोर्ट में आना पड़ा  , स्ट्रेटेजी यह थी की जब खुद प्रधानमंत्री कटघरे में होंगे तो कौन ही उनपर जजमेंट दे पायेगा।  लेकिन ऐसा हुआ नहीं 18,19.20 मार्च 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को अलाहबाद हाई कोर्ट बुलाया गया।

एक्समनिनाशन , क्रॉस एग्जामिनेशन सब हुआ और उसके बाद अलाहबाद हाई कोर्ट ने अपना जजमेंट सुनाने के लिए तारिक मुकर्रर की जून 12, 1975।  राज नारायण के वकील शांति भूषण उस समय मुंबई में थे और उन्हें वहां इनके भाई का फ़ोन आया और उस फ़ोन पर भाई ने बताया की आप  केस जीत चुके हैं और इंदिरा गाँधी का एलक्शन ख़ारिज कर दिया गया है और अगले 6 साल तक उन्हें किसी भी पब्लिक ऑफिस में पदधारक होने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इंदिरा गाँधी के दल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए अलाहबाद highcourt से समय माँगा।  मिला भी और कंडीशनल स्टे सुप्रीम कोर्ट से  मिला।  कहा गया की जब तक केस की पैरवी पूरी नहीं हो जाती इंदिरा प्रधानमंत्री रहेंगी।

लेकिन इतने में आपातकाल घोषित हो गया।  क्या क्या हुआ उसमे , वो सब को पता है , लोगों की नसबंदी करना शुरू  किया गया, जिसके लिए टारगेट दिए गए और अपने टारगेट को पूरा करने के लिए डॉक्टर्स ने कवारों की भी नसबंदी कर डाली। इसके बाद जुग्गी झोपड़ियों पर बुलडोज़र चलाये गए और वो भी बिना उनके लिए कोई alternative arrangement करते हुए , विपक्ष सब जेल में था और इसी बीच संसद का सत्र बुला कर संविधान में संशोधन किया गया।  इस संशोधन को mini constitution भी कहा गया।

संशोधन कुछ इस प्रकार का हुआ की इंदिरा गाँधी जिन कारणों और जिन आर्टिकल का उलंघन में दोषी पायी गयी वो सब बदल कर इस प्रकार बना दिए गए की अब इंदिरा दोषी नहीं रही और उनका इलेक्शन भी कैंसिल नहीं हुआ।  इस सब के बाद देश 19 महीने तक एक ऐसे काले अध्याय से गुज़रा जिसे लोग इमरजेंसी कहते हैं।

Politics is a  dirty game  ऐसा अमूमन लोग कहते हैं।  कितनी डर्टी यह हो सकती है, इस को समझने के लिए यह एक केस काफी है जहाँ अपनी गद्दी बचाने के लिए एक व्यक्ति ने प्रजातंत्र के चारोँ स्तम्भों को हिला दिया।  अख़बार ban हो गए , opposition सब जेल में डाल दी गयी और कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए उसे पूरी तरह से ही बदल दिया गया।  किस लिए ? ताकि गद्दी संभाली रहे।

हम अपने इतिहास को भूलते हैं , भूलना नहीं चाहिए क्यूंकि जितनी बार हम उसे भूलने की गलती करते हैं उतनी ही बार वो दोबारा रिपीट हो कर हमें वही सबक फिर से सिखाता है।

* इस आर्टिकल  के लिए रिसर्च के तौर पर प्रशांत भूषण की किताब "case that shook India" का reference लिया गया है 

 
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