Fri, September 25
सोलन
August 24,2019

जय-जय हिमाचल,,,,,,, 
जब भारतीय ब्रिटिश सैनिकों ने फूंक दिया था कसौली थाना,,, 
पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में कसौली से भड़की थी 1857 में पहली क्रांति की ज्वाला,,, 
रविंद्र पंवर, सोलन।

15 अगस्त को हम भारत का 73वां स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाने जा रहे हैैं और इस आजादी को पाने के लिए लगभग अढ़ाई सौ साल तक हिंदुस्तान के हजारों-लाखों देशभक्तों ने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया है। नमन है उन स्वतंत्रता सैनानियों को जिनकी बदौलत हम, आज ये दिन देख पाए हैं। यूं तो आजादी के मतवालों की बहुत सी कहानियां हम, बचपन से सुनते व पढ़ते आए हैं, लेकिन बता दें कि देश की आजादी के लिए क्रांति का जज्बा केवल भारतवर्ष के बड़े शहरों में ही नहीं था, बल्कि हिमाचल जैसा छोटा सा पहाड़ी प्रांत भी इससे अछूता नहीं रहा। सन 1857 में जब मंगल पांडे के नेतृत्व में भारत की आजादी की पहली चिंगारी सुलगी तो पहाड़ों में भी क्रांति का बिगुल बज गया था। इस दौरान मुटठी भर भारतीय ब्रिटिश सैनिकों ने सोलन जिला में कसौली छावनी स्थित पुलिस थाने को आग लगाकर, हिमाचल में पहली क्रांति की ज्वाला भड़का दी थी |

दरअसल 1800 ईस्वीं के शुरुआती दौर में ही अंग्रेजों, सिखों व गोरखाओं के युद्ध से  हिमाचल में राजनैतिक व सामाजिक व्यवस्था गड़बड़ाने लगी थी। चूंकि लगभग पूरे भारत में अंग्रेजों का राज हो गया था और पहाड़ी शासक व शासन भी इनके अधीन आ चुका था। बावजूद इसके भी यहां रजवाड़ाशाही का ही बोलबाला था, और इससे पहाड़ों की जनता तंग  आ गई थी। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा जनसाधारण के धार्मिक जीवन व सामाजिक रीति-रिवाजों में अनावश्यक हस्तक्षेप किया जा रहा था। इसी तरह देसी शासक भी इनकी गुलामी को सहन नहीं कर पा रहे थे। इसके अलावा अंग्रेज अधिकारियों  की देसी सेना के साथ पक्षपात एवं भेदभावपूर्ण नीति के कारण, हमारे सैनिकों में भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ  विद्रोह की भावना भड़क रही थी। इसका कारण कि कोई भी भारतीय सैनिक स्टाफ अफसर नहीं बन सकता था। सेना का सबसे बड़ा भारतीय अफसर भी ब्रिटिश सेना के सबसे छोटे अंग्रेज अफसर के अधीन होता था। यह सरकार, सैनिकों के सामाजिक और धार्मिक जीवन में भी हस्तक्षेप कर रही थी। हिंदू, सिख और मुस्लिम सैनिकों को ईसाई बनाने की बातें चल रही थी।

ऐसे में जब जनवरी 1857 से नई राइफल में गाय व सुअर की चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग  शुरु हुआ तो भारतीय सैनिकों से इसका विरोध किया। इसी के चलते  28 मार्च 1857 को मेरठ छावनी में  मंगल पांडे के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने इन कारतूसों के प्रयोग संबंधी आदेश का उल्लंघन करते हुए विद्रोह कर दिया। हालांकि बाद में इसे कुचल दिया गया, लेकिन यह चिंगारी अब भड़क चुकी थी। इसके बाद में मंगल पांडे को तो फांसी हो गई, लेकिन इस घटना ने आग में घी का काम किया और सारे देश में भयानक विद्रोह भड़क उठा।

उस दौर में यह बात पहुंचते-पहुंचते हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में भी देसी सैनिकों और जनसाधारण ने अंग्रेजी साम्राज्य की खिलाफत शुरु कर दी। इसी बीच अंग्रेजी अत्याचार से आजिज हिमाचल की सैनिक छावनियों में तैनात भारतीय सैनिक भी मुखर हो गए। इसकी परिणति ये हुई कि 20 अप्रैल 1857 को अंबाला राइफल डिपो के छह देसी सैनिकों ने कसौली में पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया। इसमें पुलिस ठिकाना तो जलकर राख हो गया, लेकिन यहां के घुड़सवार सैनिक जान बचाकर भाग निकले। उन दिनों कसौली सैनिक छावनी हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में ब्रिटिश सैनिक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र था। यहां विद्रोह करके क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को प्रत्यक्ष चुनौती दे दी थी।

बाद के समय में भारतीय सैनिकों के इस कारनामे को एक अंग्रेज अफसर ने अपनी पुस्तक में भी खास जोर देकर लिखा था कि महज मुटठीभर सैनिकों ने उनके पुलिस थाने को मिनटों में राख कर दिया। लिहाजा इस घटना के बाद अंग्रेजों को देसी सैनिकों और साधारण कर्मचारियों पर संदेह होने लगा और भारतीय सैनिकों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। कसौली के बाद  डगशाई, सुबाथू, कालका और जतोग छावनियों में तैनात देसी सेना में भी आजादी पाने की लालसा बलवती हो गई। इसके बाद भारतीय स्वाधीनता संग्राम की पहली लड़ाई में पहाड़ी लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिनमें से कई गुमनाम शहादतें इतिहास के पन्नों में ही दफन हो गई। इन्हीं शहादतों का परिणाम है कि हम आज आजाद हैं और देश आगे बढ़ रहा है।

अगले भाग में हम जानेंगे हिमाचल की एक और कहानी, जिसमें पहाड़ी लोगों ने आजादी की लड़ाई के महायज्ञ में अपनी आहूति दी।

--- जयहिंद, जय हिमाचल --  

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