Mon, November 30
सोलन
August 24,2019

जय-जय हिमाचल,,,,,,,
कसौली में लूटी ट्रेजरी, दरोगा बुद्धि सिंह ने खुद को मारी गोली  
पहाड़ी क्रांति से हिल गया था अंग्रेजी साम्राज्य 
रविंद्र पंवर, सोलन। 
कसौली थाने को आग के हवाले करने से क्रांति की जो चिंगारी यहां से शुरु हुई थी उससे डगशाई, सुबाथू, कालका, और जतोग छावनियों  सहित पूरे हिमाचल में आजादी पाने की लहर  दौड़ गई। लिहाजा कसौली थाने की घटना के बाद 11 मई, 1857 को ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल जाॅर्ज एनसन ने सभी पहाड़ी छावनियों के सैनिकों को अंबाला कूच करने के आदेश दिए, जिसे भारातीयों ने नकार दिया और विरोध में बंदूकें उठा ली। उस समय कसौली व जतोग में नसीरी बटालियन, अर्थात गोरखा रेजिमेंट थी, जिसके सुबेदार भीम सिंह बहादुर ने स्वयं आंदोलन की कमान संभाल ली। 13 से 16 मई के दौरान भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों पर हमला कर उन्हें भागने पर मजबूर किया। कसौली में आक्रोश इतना बढ़ गया था कि देसी सैनिकों ने कसौली की ट्रेजरी में रखे 40 हजार रुपए भी लूट लिए। इससे अंग्रेज अधिकारी भी हैरान थे कि महज 45 क्रांतिकारियों ने 200 अंग्रेज सैनिकों को धूल चटा दी और शिमला के जतोग की ओर बढ़ गए। इस घटना को अंग्रेजों के तत्कालीन कमिश्‍नर पी मैक्सवैल ने अपनी डायरी में लिखा कि यह हैरत की बात है, मुटठीभर क्रांतिकारियों ने अपने से चार गुना अधिक अंगेजी सेना को हरा दिया। 
खैर कसौली का खजाना लूटकर नसीरी बटालियन जतोग छावनी की ओर बढ़ी और रास्ते में भागते कुछ अंग्रेज सैनिकों व अधिकारियों को भी खुखरी से ही डरा दिया। इसी बीच अंग्रेजी सेना ने भी इनका पीछा किया और कुछ भारतीय सिपाहियों को पकड़ लिया गया, जबकि कुछ शहीद हो गए। उधर, क्रांतिकारी सैनिकों के नेता दरोगा बुद्धि सिंह ने अंग्रेजों के हाथों पकड़े जाने से पहले स्वयं को गोली मारकर देश की पहली क्रांति में अपने जीवन की आहूति दे दी। दूसरी ओर कई सैनिकों को जेलों में डालकर यातनाएं दी गईं और उनके घरों में भी छापे डालकर, परिवार के सदस्यों तक पर अत्याचार किए गए। उस समय कसौली के समीप लॉरेंस आश्रम जो आज प्रतिष्ठित लारेंस स्कूल सनावर के नाम से जाना जाता है, फिरंगी भगोड़ों का ठिकाना बना हुआ था। यहां के तत्कालीन गवर्नर ने लिखा कि उस रात सब बच्चों और महिलाओं को लड़कियों के हॉस्टल में छिपाया गया, जबकि पुरुषों ने सारी रात पहरा दिया। बाद में इन्हें कसौली छावनी की मिलेट्री बैरकों में शरण दी गई। 
उधर, शिमला में भी सैनिक व स्थानीय लोगों ने अंग्रेजों में भय का वातावरण बना रखा था, इसी बीच हिंदुस्तान तिब्बत रोड के निर्माता कैप्टन डेविड ब्रिगज को सेना के साथ शिमला भेजा गया। रास्ते में उनकी टक्कर क्रांतिकारी सेना से हुई जिन्होंने सायरी के समीप कैप्टन व अंग्रेजी सेना को घेरकर खूब डराया-धमकाया। इस नाजुक स्थिति में पंजाब के चीफ कमिश्‍नर जॉन लॉरेंस ने रावलपिंडी से शिमला हिल स्‍टेटस में अंग्रेज नागरिकों की सुरक्षा के लिए तार भेजा। शिमला में विद्रोह की ज्वाला अभी भी भड़क रही थी। 7 जून को शिमला नगर पालिका के प्रेसिडेंट कर्नल सीडी प्लेयर ब्लेयर ने अधिकारियों को यहां की सुरक्षा का पत्र लिखा। अब तक अंग्रेजों की पकड़ फिर से पहाड़ों में मजबूत होने लगी थी और रणनीतिक तौर पर अपने खास हिंदुस्तानी शासकों व अन्य के माध्यम से समझौते की कोशिशें चल पड़ी। उधर, बुशहर के राजा शमशेर सिंह ने अंग्रेजों द्वारा लगाया गया 15 हजार वार्षिक नजराना देना बंद करके अपनी रियासत को तंत्र घोषित कर दिया। इसके अलावा क्योंथल के राजा ने अंग्रेजों का सहयोग करके उन्हें अपने जुन्गा स्थित महल में शरण दी। 
लिहाजा अंग्रेजों व भारतीयों में यह लुका-छिपी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका। 24 मई को जतोग की क्रांतिकारी नसीरी सेना ने अपने नेता सूबेदार भीम सिंह के नेतृत्व में एक बैठक की। इसमें अंग्रेज अधिकारियों की ओर उन्हें दिए जा रहे आश्वासनों पर विचार करके व अपनी दिक्कतें देखते हुए विद्रोह को स्थगित करने का निर्णय लिया। इसके बाद सुबाथू, जतोग, कसौली व डगशाई छावनियों में भी क्रांति की आग मंद पड़ गई और अंग्रेज अधिकारी देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने में लगभग कामयाब हो गए। 
दूसरी तरफ शांत पहाड़ों में आजादी की इस जंग को मैदानों के साथ समन्वय बनाकर चलाने के लिए एक गुप्त संगठन भी बना था। इस संगठन के मुख्य नेता रामप्रसाद बैरागी थे, सुबाथू के एक मंदिर में पुजारी थे। 12 जून को इनके कुछ पत्र अंबाला के कमिश्‍नर जीसी बाॅर्नस के हाथ लग गए और गुप्त संगठन का भेद खुल गया। बैरागी द्वारा लिखे गए पत्रों के कारण उन्हें पकड़कर अंबाला ले जाया गया और जेल में फांसी दे दी। इसके अलावा अलग-अगल वेशभूषा में कार्यरत कई क्रांतिकारी गुप्तचरों को पकड़ लिया गया। साथ ही अंग्रेजों ने मंदिर, मस्जिद व गुरुद्वारों की निगरानी रखनी शुरू कर दी और साधु-संतों व फकीरों पर भी प्रतिबंध लगा दिया। 
अब भले ही अंग्रेजों ने यहां क्रांति की इस जंग को एक विद्रोह का नाम दिया हो, लेकिन देश की पहली आजादी की लड़ाई का एक अलग पहलू यह भी है कि हमारे लोगों ने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी। शिमला में क्रांतिकारियों के आतंक से डिप्टी कमिश्‍नर विलियम हेय ने सुरक्षा के लिए यहां की विभिन्न रियासतों में तैनात सैकड़ों सशस्त्र जवान लगा दिए थे। बाद में जब भगोड़े फिरंगी शिमला वापस आए तो वहां अपने घरों और अंदर रखे सामान को सुरक्षित देखकर हैरान हुए। कहीं कोई चोरी नहीं हुई थी, डाका नहीं पड़ा था और किसी तरह की लूटपाट नहीं की गई थी। मतलब भारतीय क्रांतिकारी सिर्फ अंग्रेजों को यहां से खदेड़ना चाहते थे, अराजकता फैलाना उनका उद्देश्य नहीं था। यहां तक कि शिमला बैंक का 80 हजार रुपए भी सुरक्षित पड़े थे। लेकिन दुर्भाग्य कि इस दौरान कुछ देसी शासकों व धनी लोगों ने अंग्रेजों को सहयोग किया और कई पड़ोसी रियासतों के शासकों ने भी शिमला हिल स्टेट में विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों का साथ दिया था। यहां की क्रांति को लेकर तत्कालीन लॉरेंस आश्रम ने कोड किया था कि मैदानों के बड़े शासक व स्थानीय रियासतों के राजा उनका सहयोग नहीं करते तो शिमला हिल स्टेटस में अंग्रेजों ने सब कुछ गंवा दिया था।  
--- जयहिंद, जय हिमाचल ---

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