Thu, August 05
सोलन
September 02,2019

हिंदुस्‍तान-तिब्‍बत रोड ने लिखी सोलन के अस्तित्‍व की कहानी

हजार आंधियां चलें-लाख तूफान आएवो फूल खिल के रहेंगे, जो खिलने वाले हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी है सोलन जिला की, जिसकी स्‍थापना 1 सितंबर 1972 को हुई थी। हालांकि यह जिला प्रदेश भर में अपनी विभिन्‍न विशेषताओं के चलते अव्‍वल है, बावजूद इसके भी यदि यहां राजनीतिक पिछड़ापन न होता तो शायद इस जिला की वर्तमान तस्‍वीर कुछ और उज्‍जवल होती।

वस्‍तुत: सोलन, आज देश-दुनियां में किसी परिचय का मोहताज नहीं, बात चाहे हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े औघोगिक क्षेत्र की हो, राज्‍य के शिक्षा हब की हो या फिर इंडियन मशरूम सिटी के तगमे सहित एशिया में सबसे पहली उघानिकी एवं वानिकी विश्‍वविघालय नौणी की हो और देश भर में बैमौसमी सब्जियों के उत्‍पादन या प्रदेश के सबसे बड़े व्‍यापारिक केंद्र की। सोलन ने हर क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई है और यही कारण है कि भले ही इस शहर व जिला को राजनीतिक संबल न मिला हो, लेकिन सोलन अपनी ही विशेषताओं से हर क्षेत्र में अपना सिक्‍का जमाता चला गया। 

इसलिए सोलन जनपद के लिए यह कहना अतिश्‍याक्ति न होगा कि,,,

मील के पत्‍थर थे हम तो राहे सफर में तेरी,

बस खुद से लड़े तो औरों की मंजिल बन गए।

आज हम बात करेंगे पहाड़ी प्रदेश हिमाचल के उसी प्रवेश द्वार सोलन की, जिसका भले ही अपना कोई पुराना इतिहास हो न हो, लेकिन इस शहर व जिला ने अपने दम पर, अपने भविष्‍य की इबारत लिखी। सोलन जिला की 47वीं वर्षगांठ पर हम बताएंगे कि कैसे इस शहर की नीव पड़ी और किस तरह यह जिला बनने की ओर अग्रसर हुआ।

लिहाजा कहानी शुरु करते हैं कि हिमाचल प्रदेश के निर्माता एवं राज्‍य के पहले मुख्‍यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार कहा करते थे कि सड़के पहाड़ों की भाग्‍य रेखाएं हैं,,, और यही बात सोलन शहर पर भी पुरी तरह चरितार्थ हुई। बात 19वीं शताब्‍दी की है, जब 1850 के दौरान ब्रिटिश सरकार की समर केपिटल शिमला को मैदानों से सीधा जोड़ने और तिब्‍बत तक पहुंचने के लिए हिंदुस्‍तान-तिब्‍बत रोड का निर्माण हुआ। हालांकि इससे पहले 1815 के दौरान जब अंग्रेजों ने इस क्षेत्र से गोरखाओं को खदेड़ा तो यहां की सुंदरता, सामरिक दृष्टि व आबोहवा उन्‍हें भा गई और उन्होंने सुबाथू, कसौली व डगशई में छावनियों का निर्माण कर दिया था, लेकिन सोलन कहीं नहीं था। ऐसे में भारत में ब्रतानिया हुकुमत की मुख्‍य राजधानी कलकता से ग्रीष्‍मकालीन राजधानी शिमला तक पहुंचने के लिए कसौली, सुबाथू से गंभरपुल होते हुए जतोग और शिमला तक बाहर-बाहर से रास्‍ता निकलता था, जो बहुत दुर्गम व लंबा था। ऐसे में अंग्रेज इंजीनियरों ने हिंदुस्‍तान-तिब्‍बत रोड का निर्माण किया, जिसे परवाणू से कोठी, जाबली, धर्मपुर, बड़ोग,कंडाघाट, शोघी से शिमला और सुन्‍नी–तत्‍तापानी से रामपुर होते हुए तिब्‍बत तक निकाला गया।

यहीं से शुरु हुई सोलन के अस्तित्‍व की कहानी और एक ऐसे जनपद की आधारशिला पड़ी, जो आज पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में अपनी अलग व विशेष पहचान रखता है। बताते हैं कि तब तक यह सड़क केवल कार्ट रोड थी, जिस पर कलकता से शिमला के लिए घोड़ागाड़ी चलती थी। यह उस दौर की बात है जब पहाड़ी प्रांत ही नहीं, देश के अधिकांश भाग आधुनिक विकास से अछूते थे। उस समय भी अंग्रेजी सरकार में कार्ट ट्रांसपोर्ट कंपनी थी और इस क्षेत्र में घोड़ागाड़ी की परमिशन मिसेज बैक्‍टर को मिली थी। इस कार्ट कंपनी की घोड़ाघाड़ी वहां से चलकर रास्‍ते में रुकते-रुकते, कई दिनों में शिमला पहुंचती थी। लिहाजा रास्‍ते में बग्‍गी तो एक ही रहती थी,लेकिन सफर लंबा होने के चलते इसके घोड़े कुछ किलोमीटर बाद बदले जाते थे। और हॉर्स कार्ट के एक स्‍टॉपेज के तौर पर ही सोलन में सबसे पहले पुराने बस अडडे पर कुछ ढारों का निर्माण हुआ, जहां आज शहर की प्रसद्धि मिठाई की दुकान है। इसी दौरान यहां की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए अंग्रेजों ने तत्‍कालीन बघाट के राजाओं से बस स्‍टेंड के साथ लगती पहाड़ी, जो आज मिलेट्री एरिया है, को ब्रिटिश सैनिकों की राइफल फील्‍ड बनाने के लिए 500 रुपए के वार्षिक किराए पर ले लिया। 

बाद इसके जब ब्रिटिश सैनिक अपने कैंप से बाहर निकलते तो यहां चहल-पहल बढ़ने लगी और इसी बीच इन्‍हीं अंंग्रेेेज सैनिकों, जिन्‍हें टॉमी कहा जाता था, के लिए बस स्‍टैंड पर एक बार रूम का निर्माण हुआ। यह बिल्डिंग आज भी सोलन के पुराने बस स्‍टैंड पर ग्रीन होटल के रूप में खड़ी है, जिसे संंभवतया सोलन शहर का पहला भवन माना जाता है। 

लिहाजा, बाद में जब 1855  के दौरान सोलन के समीप डायर मिकन ब्रुअरी की स्‍थापन हुई तो यहां का महत्‍व और बढ़ गया। ब्रुअरी को चलाने के लिए न केवल पश्चिम बंगाल के लोग यहां आए, बल्कि विभिन्‍न पहाड़ी क्षेत्रों से भी रोजगार पाने के लिए लोगों का आना शुरु हो गया। वर्ष1903 में कालका से शिमला के लिए बने रेल मार्ग के निर्माण से जनपद के इर्दगिर्द फैले गांवों व कस्बों के विकास को गति मिली। बाद के समय सोलन व सलोगड़ा में यहां उत्पादित कृषि उत्पादों के लिए मंडी बनी और व्यापारियों का आगमन शुरु हुआ। साथ ही सोलन, कसौली,डगशई, सुबाथू में शिक्षण व स्वास्थ्य संस्थान बने और देश के अमीर लोगों व अंग्रेजों ने कोठियों का निर्माण किया। इसमें प्रमुख रूप से 1847 का लारेंस स्‍कूल सनावर, 1913 का टीबी सैनिटोरियम धर्मपुर, 1905 में कसौली का पास्चर इंस्टीच्यूट शामिल है।

 

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अब हम बात करते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले यह क्षेत्र क्‍या था, सोलन मुख्‍यता बघाट रियासत हुआ करता था और यहां के पंवरवंशी राजाओं की कुल देवी मां शूलिनी के नाम से ही इस जनपद का नाम सोलन पड़ा, जिन्‍हें धारा नगरी से आया माना जाता है। मान्‍यता है कि इसमें 12 घाट आते थे, इसलिए रियासत का नाम बघाट पड़ा। कहावत भी है कि जिसने पानी पिया बघाट का, वह घर का रहा न घाट का, और ऐसा शायद इसलिए कहते थे कि जो लोग एक बार सोलन में आकर बसते थे, वो यहीं के होकर रह जाते थे। बाद में सोलन की यही खासियत यहां की ताकत बनी, जिसने एक छोटे से कस्‍बे को शहर के रूप में परिवर्तित किया कि लोग यहां आते रहे, बसते गए और सोलन शहर बनता रहा। इससे पहले शहर की अधिष्‍ठात्री देेेेवी मां शूलिनी के मंदिर के साथ उन्‍हीें के नाम से छोटा सा शूलिनी गांव था, जबकि दूर-दूर फैले छोटे-छोटे गांव थे, जो आज भी अपने असिस्‍तत्‍व के साथ शहरीकरण की दौड़ में पारंपि‍रिकता के साथ खड़े हैं। 

आपको बतां दें कि यह क्षेत्र वर्ष 1972 से पहले तक महासू जिले का हिस्सा रहा। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्‍य का दर्जा दिया तो एक सितंबर, 1972 को बाघल, बघाट, कुनिहार, कुठाड़, मांगल, बेजा, महलोग, नालागढ़ व क्योंथल के कुछ हिस्से,कोटी को मिलाकर एक स्वतंत्र जिले के रूप में प्रकाश में आया। यानि सोलन की स्‍थापना महासूव शिमला जिलों के कुछ भागों और पंजाब से हिमाचल में शामिल हुए नालागढ़ क्षेत्र को मिलाकर की गई। जिला के गठन के वक्त यहां चार तहसीलें अर्की, नालागढ़, सोलन, कंडाघाट व सात शहरी निकाय अर्की, नालागढ़, कसौली (छावनी बोर्ड), परवाणू, सोलन, डगशई व सुबाथू (छावनी बोर्ड) थे।

 

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आज सोलन केवल एक जिला का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसा विस्‍तृृृत भू-भाग है, जिसके कई आयाम हैं। मुख्‍य शहर प्रदेश का एक प्रमुख व्‍यापारिक केंद्र और शिक्षा हब है, जबकि यहां उघागों के साथ ही मशरूम प्रोडक्‍शन और गांवों में बैमौसमी सब्जियों का उत्‍पादन, खासकर टमाटर, शिमला मिर्च व गोभी का बीज प्रमुख है। पहाड़ों के प्रवेश द्वार पर खड़ी राज्‍य की पहली औघोगिक नगरी परवाणू का अपना महत्‍व है, जबकि उसके आगे बद़दी-बरोटीवाला-नालागढ़ प्रदेश का सबसे बड़ा औघेगिक क्षेत्र है और यहां बड़े-बड़े विश्ववि‍घालय भी स्‍थापित हैं। सोलन जिला का अर्की क्षेत्र लाइम स्‍टोन के कारण विख्‍यात है, जहां दो बड़े सीमेंट उघोग हजारों लोगों को रोजगार और सरकार को राजस्‍व दे रहे हैं। इसी तरह कंडाघाट क्षेत्र अपनी रमणीकता और चायल की ऐति‍हाासिकता के कारण विख्‍यात है। बात कसौली की करें तो यहां की आबोहवा व प्राचीन इतिहास के अलावा सीआरआई अपने आप में बहुत व सबकुछ है। यही कारण है कि सोलन जिला हिमाचल का एंट्री प्‍वाइंट होने के साथ-साथ इस पहाड़ी प्रांत के मस्‍तक पर एक रत्‍नजडि़़त मुकुट के समान शोभायामान है।  

जय हिंद, जय हिमाचल, जय सोलन,,,,,,,