Mon, October 19
सोलन
August 15,2020

जय-जय हिमाचल।। 

भारत वर्ष में हम भले ही थे कतरा, पर इस समाज में अपना वजूद तो था,

शहरों की गहमागहमी न सही, पर यहां गांव-देहातों का सरोकार तो था।

और पहाड़ी रियासतों के दमनचक्र में, सुलगती रही क्रांति की चिंगारी,

कुछ कम ही सही, पर हिम के आंचल में आजादी का वो जुनून तो था।।

 

रविंद्र पंवर, सोलन : जय-जय हिमाचल सिरीज के तहत प्रस्तुत है कहानी 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम के बाद से लेकर 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक की। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी से छुटकारे के लिए हुई 1857 की क्रांति का भले ही दमन कर दिया गया, लेकिन इसी के प्रभाव से समस्त भारत की तरह पहाड़ी क्षेत्रों में भी संवैधानिक व राजनैतिक परिवर्तन की शुरुआत हुई। इस आंदोलन के बाद देश में कंपनी सरकार के प्रभाव को समाप्त करने के लिए ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत ब्रिटिश संसद में भारत सरकार अधिनियम 1858 पारित करवाया और भारत का प्रशासन पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया। साथ ही भारत में शासन के संचालन के लिए गवर्नर जनरल की नियुक्ति करके वायसराय की उपाधि दी।

चूंकि 1857 तक पहाड़ी क्षेत्र कुछ स्थानीय शासकों तो कुछ पंजाब राज्य के अधीन था, लेकिन इस क्रांति के बाद भारत सरकार अधिनियम के तहत हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्र भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गए। उस समय पहाड़ों में दो प्रकार से सत्ता का संचालन हुआ। पंजाब हिस स्टेटस में कांगड़ा, नुरपूर के आसपास इलाकों सहित कुल्लू व लाहौल-स्पीति की रियासतें शामिल की गई, जबकि शिमला हिल स्टेटस में अपर हिमाचल की तत्कालीन रियासतें आईं। दूसरी तरफ सतलुज पार की रियासतों मंडी, सुकेत, बिलासपुर, चंबा व कुटलैहड़ को सिस-सतलुज स्टेटस कहा गया। अब रियासतों के शासक तो थे, लेकिन उनके पास शक्तियां नाममात्र रह गई, जबकि राज्य के आर्थिक, सैन्य व शासकीय मामलों में अंग्रेज अधिकारियों का हस्तक्षेप बढ़ गया। उधर, 1857 की क्रांति को कुचलने में जिन शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया, वह सम्मानित हुए और जो कंपनी सरकार के खिलाफ रहे, उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। ऐसे में जनता अंग्रेजों की दास्ता व पहाड़ी राजाओं के दमन में दबने लगी और जन-साधारण सहित कुछ राजे-रजवाड़ों में भी अंदर-अंदर ही विरोध पनपने लगाा, जो भावी आंदोलन की प्रेरणा बना।

लिहाजा इस दोहरी दास्ता के राजनैतिक वातावरण में भी पहाड़ी प्रजा ने प्रशासन के आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत जुटाई और जगह-जगह पर आंदोलन शुरु हुए। सन 1859 में बुशहर रियासत के किसानों ने नकदी भूमि लगान के खिलाफ सामुहिक असहयोग आंदोलन शुरु किया, जिसे दूम्ह आंदोलन के नाम से जाना गया। ऐसे ही 1862 में सुकेत रियासत के दमनकारी वजीर और मंडी में भी वजीर के भ्रष्टाचारी व अत्याचारी शासन के विरोध में जनांदोलन हुआ, जिसे अंग्रेज अधिकारियों के हस्तक्षेप से शांत किया गया। इसके अलावा 1877 के दौरान नालागढ़ में भी बड़ा आंदोलन हुआ, 1878 में सुकेत की जनता ने भी शासन के खिलाफ बगावत की और 1883 में बिलासपुर का अंहिसात्मक जन सत्याग्रह जब झुग्गा आंदोलन में बदला तो पूरा प्रदेश हिल उठा। तब तक शिमला अंग्रेजों की शक्ति के केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था, जहां ब्रिटिश सरकार की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी बन गई थी और तमाम शासकीय कार्य भी यहीं से होने लगे। इस समय तक बहुत से भारतीय सभ्रांत व मध्यम वर्गीय लोग शिक्षित होकर उच्च पदों पर बैठ चुके थे, जिनके मन में अपनी सरकार के सपने पनप रहे थे और कुछ राजवंशी भी जनता की सरकार के हक में थे।

उधर, कई यूरोपीय नागरिक भी भारतीयों की पीड़ा से त्रस्त होकर उनकी वकालत करने लगे थे। यही वो समय था जब भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिए एक राष्ट्र व्यापी संगठन की आवश्यकता महसूस हुई, जिसे पूरा किया ऐओ ह्यूम व उनकी पत्नी ने। यह शिमला के निवासी थी, जिनके आवास रॉथनी कैसल में कांग्रेस का बीज अंकुरित हुआ और यह परवान चढ़ा 28 दिसंबर 1885 को बंबई में। यहां भारत के पहले अखिल भारतीय राजनैतिक संगठन का सम्मेलन हुआ और इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नाम दिया गया, जो आगे चलकर देश की आजादी में मील का पत्थर साबित हुआ। सन 1892 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय परिषद अधिनियम बनाया, जिसके अंतर्गत वायसराय की कें्रदीय व प्रांतीय परिषद में स्वदेशी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, भारतीयों को यह संवैधानिक अधिकार दिलाने में कांग्रेस की अहम भूमिका रही। इसी काल में 1895 के दौरान चंबा रियासत में सार्वजनिक किसान आंदोलन हुआ, जिसमें किसानों ने बेगारी प्रथा का जमकर विरोध किया और 1897 में बाघल रियासत में भूमि लगान तो 1898 में बेजा रियासत व ठियोग में भी देशी शासकों की खिलाफत हुई। इस काल तक कुछ शासक भी अंग्रेजी राज से तंग आकर स्वतंत्रता के पक्ष में हो गए थे। 1899 में बुशहर के राजा, रावीं ठकुराई के शासक और कोटी के राणा ने भी अंग्रेजी आदेशों को मानने से इंकार कर दिया, जबकि 1905 में बाघल की प्रजा ने खुला विद्रोह कर दिया।

खैर पूरे देश में कांग्रेस के बैनर तले अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ असंतोष का माहौल बनने लगा, लेकिन कई देशभक्त कांग्रेस के शांतिपूर्ण संवैधानिक संग्राम से संतुष्ट न थे। ऐसे में ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति को जड़ से उखाडऩे के लिए गुप्त संगठन बनने लगे और इन्होंने सशस्त्र क्रांति का रास्ता अख्तियार कर लिया। इसका असर पहाड़ी क्षेत्रों पर भी पड़ा और यहां भी सशस्त्र क्रांति का बिगुल बज उठा। इस समय तक समाचार पत्रों के माध्यम से भी देश भर में क्रांति व स्वतंत्रता आंदोलन की सूचनाएं यहां से वहां फैलने लगी और क्रांतिकारियों के साथ ही लोग भी एकजुट होने लगे थे। इसी का नतीजा था कि हिमाचल के ऊना से बाबा लच्छन दास आर्य ने पुलिस की नौकरी छोड़कर अपनी पत्नी सहित राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में प्रवेश किया। 1906 में लाला लाजपत राय ऊना आए, जहां आर्य समाज के प्रचार की आड़ में क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की गई। इसी बीच अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो, की नीति के तहत कुछ मुस्लिम नेताओं को बरगलाकर ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना करवाकर कांग्रेस के आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास किया, जिसकी भूमिका भी शिमला से ही बंधी थी। ऐसे में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1909 में भारतीय परिषद अधिनियम पारित किया, जिसे मिंटो मार्ले सुधार का नाम दिया गया। पहाड़ी रियासतों में मिंटो मार्ले सुधार के प्रति असंतोष पनपा और समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में भी इसकी घोर आलोचना होने लगी।

पर्वतीय क्षेत्र में स्वाधीनता आंदोलन के अंतर्गत 1912 में मंडी के राजा की मौत के बाद उनकी रानी ललिता कुमारी ने राज वैभव छोड़कर आजादी की लड़ाई शुरु कर दी, जो रानी खैरगढ़ी के नाम से मशहूर हुई। 1914 में मंडी के ही एक अध्यापक हरदेव राम ने यहां गदर पार्टी की स्थापना की और पंजाब के क्रांतिकारियों से मिलकर गोला-बारुद व हथियार जमा किए जाने लगे। सन 1919 तक कांग्रेस में महात्मा गांधी का प्रभाव बढ़ गया था, जिनके नेतृत्व में पहाड़ों के कई क्रांतिकारी व देशभक्त भी कांग्रेस में शामिल हो गए। 1920 के अंत तक पहाड़ों में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन जोर पकड़ चुका था और कई क्रांतिकारी देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने लगे थे। 1921 के दौरान यहां असहयोग आंदोलन के तहत कई प्रदर्शन हुए, कई नेताओं को पकड़कर जेलों में बंद कर दिया गया। 23 मई 1921 को महात्मा गांधी शिमला आए तो स्थानीय आंदोलनकारियों ने यहां विदेशी वस्त्रों की होली जलाई, जिससे संघर्ष तो तेज हुआ ही, खादी को भी बढ़ावा मिला। इसी काल में कुनिहार के बाबू कांशीराम और कोटगढ़ में सत्यानंद स्टोक्स ने लोगों को जागृत करना शुरु किया, जिन्हें बाद में जेल की हवा भी खानी पड़ी। दिसंबर 1921 के दौरान ही शिमला में इंग्लैंड के युवराज प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर कांग्रेस ने काले झंडे दिखाए व हड़ताल की। 1922 में सिरमौर में पंडित राजेंद्र दत्त और चौधरी शेरजंग ने विशेष अभियान चलाया। नवंबर 1924 में सुकेत रियासत में रतन सिंह के नेतृत्व में सरकारी कार्यालयों का घेराव हुआ और आंदोलनकारी बढ़ते-बढ़ते सुंदरनगर तक आ पहुंचे, जहां राजा की मांग पर आई ब्रिटिश सेना व भीड़ में हिंसक टकराव हुआ।

आखिरकार सन 1925 तक हिमाचल के अधिकांश भागों में राष्ट्रीय आंदोलन तेज हो गया, हजारों नवयुवक इसके भागीदार बन गए, जो देश के कोने-कोने में जाकर प्रशिक्षण एवं आंदोलनों में भाग लेते और पहाड़ों में भी क्रांति की ज्वाला को भड़काते रहे। यहां की लगभग हर रियासत व ठकुराई में विद्रोह होने लगे और स्थानीय शासक अंग्रेजी सेना की मदद से इसे दबाते रहे, लेकिन आजादी के मतवालों के हौंसले पस्त नहीं हो पा रहे थे। इसी काल में सोलन में सनातन धर्म सभा की स्थापना हुई, जिसमें राजा बघाट राजा दुर्गा सिंह ने भी सहयोग किया और इसकी आड़ में देशभक्ति की भावना का प्रचार-प्रसार होता रहा। 1926-27 में ठियोग रियासत में विद्रोह हुआ, जहां राजवंश ने भी जनता का समर्थन किया। जून 1927 में लाला लाजपत राय व मदन मोहन मालवीय ने शिमला आकर विशाल सभा की। वर्ष 1927 में सुजानपुर के ताल में सम्मेलन हुआ, जिसमें सरोजनी नायडू भी पहुंची थी और यहीं पर बाबा कांशीराम के जोशीले गीतों व कविताओं को सुनकर उन्हें बुलबुल-ए-पहाड़ का खिताब दिया गया। दूसरी ओर हमीरपुर के क्रांतिकारी यशपाल लाहौर में नौजवान भारत सभा बनाकर बम बनाने में जुटे थे, जिन्होंने वेष बदलकर कई क्रांतिकारी गतिविधियां चलाईं। सिरमौर के शिवानंद रमौल भी इस जंग में सक्रिय हो गए थे। फरवरी 1930 में बिलासपुर के अंदर भूमि-बंदोबस्त को लेकर लोग मुखर हो गए, प्रशासन ने इसका दमन लाठीचार्ज से किया, जिसे डांडरा आंदोलन के नाम से जाना गया। सन 1930 महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन व दांडी मार्च का भी प्रदेश में बड़ा प्रभाव पड़ा, शिमला सहित विभिन्न स्थानों पर जलसे व रैलियों का आयोजन हुआ और कई सत्याग्रही गिरफ्तार किए गए। इसी बीच हमीरपुर के क्रांतिकारी इंद्रपाल व साथियों ने कांगड़ा क्षेत्र में क्रांति की अलख जगाई और सिरमौर, कुल्लू, चंबा, मंडी व ऊना सहित हर क्षेत्र में एक तरफ सत्याग्रही तो दूसरी तरफ क्रांतिकारी संगठन, राजाओं व अंग्रेज अफसरों की नाक में दम किए हुए थे। इसी दौराना मार्च 1931 में गांधी जी सहित नेहरु व अन्य राष्ट्रीय नेता इरविन समझौते के लिए शिमला आए, जिनसे मिलकर यहां के देशभक्तों को बड़ा संबल मिला।

लिहाजा सन 1935 तक पहाड़ों में स्वतंत्रता आंदोलन को तेज करने के लिए अनेक संगठन खड़े हो गए थे, जिसमें प्रजामंडल प्रमुख था। इसी तरह चंबा में सेवक संघ बना तो मंडी में प्रजा मंडल का गठन हुआ, कुल्लू में लालचंद प्रार्थी ने ग्राम सुधार सभा और भज्जी में भास्करानंद शर्मा ने प्रजामंडल की गतिविधियां चलाईं। वर्ष 1937 में पहली बार देश भर में प्रांतीय विधानमंडलों के प्रत्यक्ष चुनाव हुए। चुनाव के बाद होशियारपुर में कांग्रेस सम्मेलन हुआ, जिसमें हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों के नेता शामिल हुए और यहीं पर पंडित जवाहर लाल नेहरु ने बाबा कांशीराम को पहाड़ी गांधी की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसे ही संघर्षों के चलते दिसंबर 1938 के दौरान शिमला में हिमालय रियासती प्रजामंडल की स्थापना हुई, जिसमें पंडित पदम देव व भागमल सोहटा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसमें पर्वतीय रियासतों की विभिन्न संस्थाओं और प्रजामंडलों का एकीकरण किया गया और यहां योजनाबद्ध तरीके से आंदोलन शुरु हुआ। इन दिनों गांधी जी की शिष्या रानी अमृतकौर जो शिमला में रहती थी, वह भी आंदोलनकारियों के साथ हो गई। 1939 के दौरान कुनिहार में भी प्रजामंडल गठित हुआ, जहां राणा हरदेव सिंह पहले रियासती शासक बने, जिन्होंने अपने दरबार हॉल में ही प्रजा की लोकतंत्रीय मांग को मानकर उनका साथ दिया। इसी दौरान धामी में भी प्रजामंडल बना, 16 जुलाई 1939 को इनका एक प्रतिनिधिमंडल वहां के राणा से मिलने गया तो यह एक जुलूस की शक्ल में बदल गया। इससे घबराकर सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर पथराव व गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और कई घायल हुए। इस धामी गोलीकांड के बाद लगभग तीन महीनों तक रियासती सैनिकों का स्थानीय प्रजा व आंदोलनकारियों पर अत्याचार चला रहा, जिसमें 200 से अधिक लोगों पर मुकद्दमें चलाए गए और देश भर में इस घटना की घोर निंदा हुई।

खैर दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान महात्मा गांधी ने देश वासियों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग की अपील की और 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन शुरु किया, जिसके तहत पहाड़ों में भी सैकड़ों लोगों को जगह-जगह गिरफ्तार किया गया। 26 जनवरी 1942 को पहाड़ी रियासतों व अंग्रेजों के अधीन क्षेत्रों में स्वाधीनता प्रतिज्ञा दिवस मनाया गया, जिसमें भी सैकड़ों गिरफ्तारियां हुई। इसके कुछ समय बाद गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार से सीधी लड़ाई के लिए अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया और करो व मरो का नारा दिया। पूरे देश के साथ पहाड़ी इलाकों में भी धरने-प्रदर्शन व जलसे हुए, जबकि दूसरी तरफ गरम दल के नेता सुभाष चंद्र बोस की सशस्त्र क्रांति को सफल बनाने में लगे थे। ऐसे में ब्रितानिया हुकुम पर दोनों तरफ से दबाव बन रहा था, जिसके चलते अंग्रेजी फौज ने रियासती शासकों के साथ मिलकर पहाड़ों के हजारों लोगों को बंदी बनाया। उधर, सिरमौर रियासत में ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू राजा का जुल्म स्थानीय किसानों व जनता पर बढ़ता जा रहा था, जिसके चलते पझौता क्षेत्र के किसानों ने एक संगठन बनाकर विरोध करना शुरू किया और सैनिक इसका दमन करने लगे। इस बीच 11 जून 1943 को अत्याचारी फौज ने कोटी-मावगा गांव में एक आंदोलनकारी के घर को आग लगा दी और सूचना पाकर आसपास के सैकड़ों ग्रामीण वहां पहुंचे। उत्तेजित भीड़ ने फौजियों व रियासती पुलिस से टक्कर लेने का प्रयास किया, लेकिन निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दी गई, जिसमें कटोगड़ा गांव के कामनाराम मौके पर ही शहीद हो गए, जबकि कई घायल हुए। बाद में यह घटना पझौता आंदोलन के तौर पर मशहूर हुई, जिसमें लगभग 69 आंदोलनकारियों पर मामले दर्ज करके उन्हें सजा दी गई। इसी काल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस विदेशों में बंदी भारतीय सैनिकों व प्रवासी भारतीयों को एकत्र करके आजाद हिंद फौज बना चुके थे, जिसमें हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों से भी लगभग 4 हजार युवकों ने भाग लिया। आजाद हिंद फौज के कौमी गीत, कदम पे कदम बढ़ाए जा, गीत खुशी के गाए जा, ये जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा, का संगीत निर्देशन भी कांगड़ा घन्यारा के राम सिंह ठाकुर ने किया था।

जून 1945 में ब्रिटिश वायसराय ने शिमला में राष्ट्रीय नेताओं का सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया, जिसमें गांधी जी व नेहरु सहित मुस्लिम लीग और अकाली दल के नेताओं ने भी भाग लिया। इस दौरान कांग्रेस नेता कई दिनों तक शिमला में रुके, जिनसे मिलने के लिए प्रदेश भर से सत्याग्रही व क्रांतिकारी भी पहुंचे और इसके बाद पहाड़ों के स्वतंत्रता संग्राम ने और हवा पकड़ ली।  इसी साल दिसंबर में पहाड़ी रियासतों के प्रतिनिधियों ने हिमालयन हिल स्टेटस रिजनल काउंसिल की नींव रखी, जिसके सदस्यों ने गांव-गांव जाकर जागृति अभियान शुरू किया। इसी के साथ लगभग हर रियासत में प्रजा मंडल के गठन भी हुए और आजादी के मतवालों ने गुप्त रुप से व जलसे-जुलुसों के तौर पर रियासती शासन व ब्रितानिया सरकार की खिलाफत शुरू कर दी। इसी कड़ी में मई 1946 के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सोलन में प्रजामंडल व किसान सभा को संबोधित किया।

इसके बाद पहाड़ों में वर्ष 1947 से आजादी की लड़ाई व स्थानीय राजनीति का नया युग शुरू हुआ, जिसमें लाहौर में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे डॉ. यशवंत सिंह परमार को वापस हिमाचल लाया गया। वह सिरमौर रियासत में जज थे, जिन्हें एक विवाद के चलते 1941 में परिवार सहित सात वर्ष के लिए रियासत से निष्कासित कर दिया गया था। मार्च, 1947 को शिमला में हिमालयन हिल स्टेटस रिजनल कांउसिल के सम्मेलन में डॉ. यशवंत सिंह परमार को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया। जून तक काउंसिल नेताओं में मतभेद के चलते एक धड़ेे ने अलग होकर हिमालयन हिल स्टेटस सब-रीजनल कांउसिल का गठन किया, जिसमें डॉ. परमार को निर्विवाद प्रधान चुन लिया गया। इसके बाद उन्होंने शिमला से ही विभिन्न पहाड़ी रियासतों में प्रजा मंडल आंदोलनों का संचालन किया, जबकि मंडल की इकाइयां अपने-अपने स्तर पर अपने-अपने क्षेत्रों में डटी रहीं। इसी कड़ी में शांगरी रियासत में भी प्रजामंडल गठित हुआ और 31 जुलाई को इसके पहले सम्मेलन में उमड़ी भीड़ के भय से शांगरी के शासक गद्दी छोड़कर पलायन कर गए। इसी के साथ 1 अगस्त 1947 को पहाड़ों के लिए सुबह का वो सूरज निकला, जिसकी रोशनी ने भविष्य के अलग पहाड़ी प्रांत की नींव रखी। राजा के जाने पर शांगरी प्रजामंडल अस्थायी सरकार की स्थापना की गई और इस प्रकार पहाड़ी रियासतों में पहली लोक राज्य सरकार की शुरुआत शांगरी रियासत से हुई।

अंतत: देश भर में चल रही आजादी की जंग के चलते 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज लोग, भारत छोड़कर चले गए और देश आजाद भी हो गया, साथ ही पहाड़ी राजाओं को भी ब्रितानिया हुकुमत से मुक्ति मिली, लेकिन पहाड़ों की जनता फिर भी स्थानीय शासकों की दासता से जकड़ी हुई थी। ब्रिटिश सरकार के अधीन पहाड़ी इलाकों में तो आजादी का जश्न मनाया ही गया, विभिन्न रियासतों में भी आंदोलनकारियों व जनता ने स्वतंत्रता की खुशियां मनाई, जिसे कई जगह देशी शासकों द्वारा दबाने का भी प्रयास किया गया। इसी दिन ठियोग रियासत के प्रजामंडल ने राणा को सत्ता छोडऩे पर मजबूर किया और यहां भी अस्थायी लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ। प्रजामंडल का यही दबाव जुब्बल रियासत में भी काम आया और केंद्र के हस्तक्षेप से यहां भी अस्थायी लोकतांत्रिक मंत्रिमंडल की स्थापना हुई। दूसरी तरफ मंडी, सुकेत, बिलासपुर व सिरमौर जैसी बड़ी रियासतों में अब भी आंदोलनकारियों व जनता का दमनचक्र जारी था। इसी बीच 21 दिसंबर 1947 को हिमालयन हिल स्टेटस रिजनल कांउसिल की एक कॉन्फ्रेंस प्रधान सत्यदेव बुशैहरी की अध्यक्षता में शांगरी रियासत की राजधानी बड़ा गांव में हुई, जहां से सभी पहाड़ी रियासतों को मिलाकर एक पहाड़ी प्रांत बनाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया। दूसरी तरफ डॉ. यशवंत सिंह परमार अपनी हिमालयन हिल स्टेटस सब-रिजनल कांउसिल के माध्यम से पहाड़ी रियासतों के भारत संघ में विलय का प्रचार-प्रसार करते रहे।

लिहाजा सन 1947 के अंतिम दिन तक पहाड़ी रियासतों में राजसत्ता से आजादी का आंदोलन चला रहा। जनता में इस अधूरी स्वतंत्रता को लेकर अनिश्चितता का वातावरण था तो आंदोलनकारी संपूर्ण स्वाधीनता के बादलों को हटाने के प्रयास में जुटे रहे। दूसरी तरफ देश भर में उगे आजादी के इस सूरज की रोशनी से पहाड़ी राजा-राणाओं की आंखें भी खुल सी गई थी और वह भी समय की दीवार पर लिखी भविष्य की ईबारत पढऩे लगे थे, लेकिन उनके अंदर बसी रजवाड़ाशाही लोक-तंत्र की इस आहट को अनसुना करने का असफल प्रयास कर रही थी। खैर भारत देश तो अंग्रेजों के शासन से मुक्त हो गया, लेकिन पहाड़ी जनता की आजादी अभी दूर थी, जिसके लिए यहां के लोगों को अभी और लड़ाई लडऩी थी। पहाड़ से जीवट वाली पहाड़ी जनता का यह संघर्ष अपने चरम तक चला भी और सफलता भी मिली। आज हमारी कहानी भारतवर्ष के स्वतंत्रता संग्राम में हिमाचल के योगदान की थी, जिसमें पहाड़ों के युवाओं ने अपने प्राणों का बलिदान भी दिया, सैकड़ों को कई-कई सालों की सजा काटनी पड़ी और देश के आजाद होने पर भी उन्हें पहाड़ी राजाओं के शासन से मुक्ति के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। इसमें हमें 15 अप्रैल 1948 को सफलता भी मिली, जब 30 पहाड़ी रियासतों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ, लेकिन यह कहानी फिर कभी और सही, अभी हम जय-जय हिमाचल के इस एपिसोड को यहीं पर विराम देते हैं। हिमाचल बनने के इतिहास की आगे की कहानी फिर आपसे साझा करेंगे, तब तक के लिए,

जय हिंद, जय हिमाचल,,,

 
 
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