Mon, September 28
सोलन
October 03,2019

न नोचो बेटियों को एक दिन समाज संवेदनाहीन हो जाएगा।
जब न रहेगी प्रक्रति तो अकेला पौरुष क्या कर पाएगा।।

देश-प्रदेश में बढ़ती आबादी के साथ ही आज समाज में चारों तरफ अपराधों का बोलबाला है और भारतवर्ष जैसे संस्कारी देश के लिए यह शर्म की बात है कि जिन महिलाओं को कभी देवी तुल्य मानकर पूजा जाता था, आज उसी समाज में महिलाओं की स्थिति भोग्या की तरह रह गई है। इससे भी बड़ी पीड़ा ये है कि भारत वर्ष में बड़ी उम्र की महिलाएं व युवतियां ही नहीं, नाबालिग व बेहद छोटी उम्र की बच्चियां तक वहशीपन का शिकार हो रही हैं।

ऐसे में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के नारे से कहीं ज्यादा जरूरी है कि बेटे पढ़ाओ और बेटी बचाओ और मर्द कहलवाने का शौक रखनेवालों को पहले जानवर से इंसान बनाओ ।

मैं एक बार फिर से फेफड़े फाड़ कर चिल्लाउ , फिर से समाज को कोसूं , फिर से दर्द की स्याही मेें कलम ड़ुबो कर 48 डिग्री पारे के बावजूद कागज के पन्नों पर लफजों को ठिठुरता छोड़ दू , लेकिन क्या कोई सुन रहा है , किसे परवाह है ,     हुआ तो हुआ  कहने वाले हमारे समाज में क्या किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता? टाफी देने वाले तुम । बहलाने फुसलाने वाले तुम । काम देने वाले तुम । कपड़े उतारने वाले तुम ।  आवाज दबाने वाले तुम । गला घोंटने वाले तुम । हाथ पांव तोडने वाले तुम । शरीर नोचने वाले तुम। बच्ची है । लड़की है। औरत है । मजबूर है । क्या कर सकती है । अकड़ दिखाती है । बाप अकड़ता है भाई अकड़ता है । घर और पुलिस की धौंस दिखाती है । तो चलो सबक सिखाते है इसे इसकी औकात बताते है । लगे हाथों हिसाब बराबर करते है और हर हिसाब का फैंसला एक ही रेप ओर सिर्फ रेप

मजबूर असहाय कमजोर 8  ्र 1० साल की बच्ची के सामने रेपिस्ट अपने आप को शक्तिमान का अवतार समझता है । सभी हैवानियत, वैशीपन को धर्म का चश्मा लगाकर देखते है । कभी मंदिर के चबूतरे पर , तो कभी मस्जिद के किसी कोने में । समाज धर्म के व्यापारियों से भरा पड़ा है । बलात्कार का मुददा हो तो देश समाज और पालिटिशियन धर्म की मच्छरदानी के अन्दर मुंह छिपाकर बैठ जाता है । औरत शरीर सौदे और सजा दोनों में इस्तेमाल होती है । राजनितिक दल भी औरत को उठाने पटकने या फिर टालमटोल के बेतुके फार्मुले अपनाकर उसे अंगुठा दिखा देतेे है । औरत परेशान ,उलझती ।  झुलसती रहे और अकेले अपने हक के लिए लड़ती रहे चाहे वो किसी भी तबके पीड़ी या उम्र की ही क्यूं ना हो ।

समाज की सोच न्याय के मामले में हमेशा से स्लो मोशन में रही है । जिसे आज तक  बर्बरता से निपटाने का कोई रास्ता नजर नहीं आया । लेकिन अब औरत का भरोसा टूट चुका है । धरती पर देवताओं का वास पता नहीं किस युग में रहा होगा , पर राक्षसों  का वास तो जबसे होश संभला है, देखती सुनती आ रही हूंॅ । हर बलात्कार के बाद शहर में कर्फयू लगता है सड़को ,चैराहों पर मोंमब्बतियां जलती और पिघलती है, पर समाज नहीं पिघलता । बहुत हुआ तो सेक दिल्ली के जंतर मंतर और रामलीला मैदान तक पहुंचता है , लेकिन सेक तो सेक है, ठंड़ा पड़ जाता है। बाद में शहर भी नार्मल और लोग भी नार्मल ़। नार्मल नहीं रहती तो एक औरत की जात । फिर कोई नया शहर , कोई नई बच्ची, कोई औरत । फिर कोई नई चोट, फिर एक नया रेप। फिर ख्ुाल जाऐगी एक नई फाईल , उस पर होगा एक नया केस । खाओ , पियो , खेलो और मौज करने वाली उम्र की बच्चियां  भी गैंग रेप की शिकार हो रही है । हम जंगल राज में जी रहे है । पुलिस भी रिश्वत लेकर सबूत मिटा रही है, या रेपिस्ट का साथ दे रही है । और तो और पुलिस का अफसर बच्ची की हत्या से पहले दुष्कर्म करने से नहीं चूकता । सिस्टम को गालियां , वटसऐप पर दुआओं का ढेर , रेस्ट इन पीस की लंबी होती लिस्ट और हाय हाय के शोर बदलाव की खोखली बाते, ख्ंाड़ीत विश्वास और क्षत्र विश्त शरीर , विश्वास टूटने का दर्द, सो अलग । पल पल गहराता अंधेरा । बलात्कार के बाद औरत के नंगे शरीर की नुमाईश, और न जाने क्या क्या ,,,, इस नपुंसक समाज में सिर्फ फोन , कैमरों की बैटरी ड़ेड नहीं होती , ब्ल्कि सारा समाज ही इस मुददे पर मानसिक और भावनात्मक रूप से डेड हो चुका है। सभी तमाशबीन मुर्दो की भीड में तबदील हो जाते हैं।

लिहाजा ऐसा भी नहीं कि संपूर्ण पुरुष समाज ही निम्न स्तर पर पहुंच चुका है, लेकिन जब हमारा देश पुरुष प्रधान है तो जो आगे व उपर है, उस पर अंगुलियां उठना लाजमी है। ऐसे में समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को यदि रोकना है तो इस पुरुष समाज को ही आगे आना होगा। कारण सीधा सा है कि महिला किसी की पत्नी बनने से पहले किसी की बेटी व बहन है और अपनी बेटी व बहनों की रक्षा के लिए पुरुषों को ही आगे आना होगा।

Sponsored Ads