Fri, September 24
सोलन
September 27,2019

धर्मशाला में भाजपा रखेगी कब्जा या कांग्रेस लगाएगी सेंध
न्यूज एडिटर रविंद्र पंवर के साथ जाने धर्मशाला की राजनीतिक समीक्षा
1967 से 6 बार भाजपा, 5 बार कांग्रेस और एक दफा रहा जनता पार्टी का विधायक
किशन कपूर के सांसद बन जाने से खाली हुई है धर्मशाला सीट
कांग्रेस-भाजपा में टिकट के लिए मचा है घमासान
कांग्रेस ने हाईकमान को भेजे 7 नाम, भाजपा में 6 पर होगा फैसला
रविंद्र पंवर, सोलन: धर्मशाला का नाम सुनते ही किसी के भी जेहन में धौलाधार की बर्फ से ढकी सफेद चोटियों की तलहटी में बसा खूबसूरत शहर और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम की तस्वीर घूम जाती है। लेकिन धर्मशाला का महत्व इतना ही नहीं है, यह हिमाचल सरकार की शीतकालीन राजधानी भी है, जिसे वीरभद्र सरकार ने प्रदेष की दूसरी राजधानी घोषित किया था। और इससे भी बढ़कर यहां मैक्लोडगंज में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए बौध धर्मगुरु दलाईलामा का निवास और निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय भी है।
लिहाजा आज हम बात करेंगे धर्मशाला उपचुनाव की, जिसे लेकर प्रदेश की दोनों पार्टियों भाजपा व कांग्रेस में जमीनी स्तर पर लड़ाई शुरु हो चुकी है। यहां 21 अक्टूबर को विधानसभा के उपचुनाव होने जा रहे हैं, और यह सीट प्रदेश सरकार में मंत्री रहे किशन कपूर के लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बन जाने से खाली हुई है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में किशन कपूर 5वीं बार धर्मशाला से विधायक चुने गए थे, जिन्हें जयराम सरकार में केबिनेट मंत्री बनाया गया था, जबकि वह पूर्व धूमल सरकार में भी ताकतवर मंत्री थे। खैर हालिया लोकसभा चुनाव में मिशन मोदी रिपीट के तहत आलाकमान ने एक मंत्री को ही चुनाव मैदान में उतार दिया और किशन रिकाॅर्ड मतों से विजयी भी हुए।
---
इससे पहले कि हम राजनीतिक चर्चा में आगे बढ़ें, धर्मशाला के अस्तित्व और यहां के राजनीतिक व चुनावी सफर को भी जाने लेना चाहिए।
तो बात 19वीं शताब्दी की है जब कांगड़ा में कटोच वंश के राजओं का शासन था। इसी दौरान सिखों की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण पहाड़ी राजाओं के साथ युद्व चले हुए थे। इसी बीच महाराजा रणजीत सिंह और कांगड़ा के राजा संसार चंद के बीच 1810 की ज्वालामुखी संधि के चलते यह क्षेत्र पंजाब का हिस्सा बन गया। यही वो समय था जब कटोच राजाओं से उनका स्टेटस छीनकर, उन्हें मात्र जागीरदार बना दिया गया। लिहाजा बाद में एंग्लो-सिख युद्ध और 1846 की लाहौर संधि के तहत कांगड़ा की पहाड़ी रियासतें अंग्रेजी सरकार के अधीन आ गई। इसके बाद 1849 में अंग्रेजों ने जब कांगड़ा के साथ लगती पहाड़ी पर सैनिकों का ठिकाना बनाया तो धर्मशाला एक सैनिक छावनी के तौर पर अस्तित्व में आया।
बाद में यहां बढ़ती जनसंख्या और ब्रिटिश लोगों को सुविधाएं देने के चलते धर्मशाला को कांगड़ा का जिला मुख्यालय घोषित करके इसे नगर पालिका बनाया गया। इसी दौरान देश में 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ तो धर्मशाला देसी क्रांति और कई शहादतों का गवाह भी बना। 1947 में भारत आजाद भी हो गया और 1948 में हिमाचल भी बन गया, लेकिन कांगड़ा पंजाब राज्य का ही हिस्सा रहा। ऐसे में पहाड़ी नेताओं की कोशिशों और हिमाचल निर्माता डा यशवंत सिंह परमार सहित उनके सहयोगियों के अथक प्रयासों से 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के साथ ही कांगड़ा सहित अन्य पहाड़ी इलाकों को हिमाचल में शामिल किया गया।
इसके बाद यहां 1967 में पहली बार हिमाचल विधानसभा के चुनाव हुए और इसमें कांग्रेस के आरके चंद विधायक बने।
1972 में कांग्रेस के चंद्र वर्कर विधानसभा चुनाव जीते, जबकि 1977 में इमरजेंसी के विरोधस्वरूप जनता पार्टी के ब्रजलाल ने बाजी मारी।
1982 के विधानसभा चुनाव तक भारतीय जनता पार्टी का गठन हो चुका था और इस दफा ब्रजलाल ने भाजपा टिकट पर विधानसभा की राह पकड़ी।
इसके बाद 1985 में कांग्रेस के मूलराज पाधा विधायक बने, जबकि 1990 से धर्मशाला में भाजपा का किशन युग शुरु हो गया और 1993 व 1998 के विधानसभा चुनाव में किशन कपूर ने अपना दबदबा बनाए रखा।
वर्ष 2003 में कांग्रेस टिकट पर चंद्रेश कुमारी की एंट्री हुई, लेकिन 2007 के चुनाव में फिर से किशन कपूर विजयी हुए।
वर्ष 2012 में कांग्रेस की ओर से सुधीर शर्मा विधायक बने और 2017 के विधानसभा चुनाव में धर्मशाला सीट फिर से भाजपा के किशन कपूर के हाथों में आ गई।
इन्हीं सालों के दौरान कांग्रेस सरकार ने धर्मशाला को नगर निगम बनाया और केंद्र की स्मार्ट सिटी योजना के तहत इस पहाड़ी नगर को भी शहरी विकास के दायरे में शामिल किया गया।
---
अब बात करते हैं वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम की, जिसमें विधानसभा के उपचुनाव तो हैं ही, कांगड़ा की राजनीति में पत्र बम की धमक भी है। यहां 21 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव में जहां एक ओर प्रदेश में भाजपा नेत्रत्व वाली सरकार की प्रतिष्ठा दाव पर लगी है तो कांग्रेस को विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में हार की जलालत दूर करने का एक अवसर।
आपको बता दें कि यह उपचुनाव कांग्रेस से अधिक भाजपा सरकार की नाक का सवाल है। और यहीं पर भाजपा में पहले टिकट के लिए मारोमार है तो उसके बाद जीत बरकार रखने की चुनौती।
हालांकि किशन कपूर की चाहत थी कि उनके बेटे ही उनकी राजनीतिक विरासत संभाले, लेकिन हाईकमान के पुत्रमोह को दरकिनार करने के चलते उनकी उम्मीद टूट गई है।
अब यहां टिकट को लेकर भाजपा खेमे में एक अनार, सौ बीमार वाली कहावत चल रही है। टिकट की पैरवी करने के संकट से बचने के लिए प्रदेश भाजपा ने केंद्रीय संसदीय बोर्ड पर ही इसका फैसला छोड़ दिया है। इसके लिए प्रदेश से 6 दावेदारों के नामों का पैनल संसदीय बोर्ड को भेजा गया है।
इनमें शांता समर्थक राजीव भारद्वाज, युवा नेता विशाल नेहरिया व उमेश दत्त के अलावा क्रिकेट एसोसिएशन की पिच से संजय शर्मा भी हैं और सचिन शर्मा व अनिल चैधरी के नाम भी शामिल हैंै।
अब इनमें से टिकट किसे मिलेगा, ये तो मोदी-शााह की जोड़ी और नडडा की सरदारी ही तय करेगी, लेकिन धर्मशाला के धरातल पर भाजपा की राजनीति में घमासान जरुुर है।
---
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी में भी टिकट की चाहत में कम सिर फुटौव्वल नहीं हो रही। यहां एक तरफ ब्लाॅक कांग्रेस कमेटी ने पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा की फेवर में सिंगल लाइन प्रस्ताव पारित करके भेज दिया है कि उन्हें ही उपचुनाव का टिकट दिया जाए।
तो दूसरी तरफ पार्टी के कई अन्य नेता भी अपने-अपने स्तर पर लाबिंग कर रहे हैं और कुल 6 नेताओं ने धर्मशाला उपचुनाव के लिए कांग्रेस के टिकट को आवेदन किया है।
इनमें पूर्व विधायक मूलराज पाधा के बेटे पुनीश पाधा, मनोज कुमार, शुभकरण, विजय कर्ण, देविंद्र सिंह और रजनी व्यास शामिल हैं। प्रदेश कांग्रेस की ओर से इन सभी नामों को पार्टी आलाकमान के पास भेज दिया गया है और वहीं से टिकट का फैसला भी होगा।
---
खैर चलो राजनीति की फितरत है कि कहो कुछ, करो कुछ, जरुरी होता ये है और होता वो है।
इसी कशमकश के भीतर इन दिनों प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा के नेता बे-वजह अपनी माथापच्ची कर रहे हैं, क्योंकि दोनों पार्टियों में होना वही है, जो केंद्रीय नेता चाहेंगे।
बावजूद इसके भी यहां के नेता व कार्यकर्ता अपने सीरे से राजनीति की रस्सी को खींचकर अपनी ओर करना चाह रहेे हैं, जबकि यह तो रबड़ की रस्सी है जो खिंचते हुए लंबी ही होगी, न इधर आएगी और न उधर जाएगी।
लिहाजा उपचुनाव होते-होते समीकरण क्या बनेंगे, यह तो बाद की बात है, लेकिन अभी तो नेता व कार्यकर्ताओं सहित आम जनता की नजर भी बस उम्मीदवारों की घोषणा पर टिकी है। यह इंतजार भी जल्द ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि उपचुनाव की नामांकन प्रक्रिया में चंद ही दिन शेष बचे हैं, जिसके लिए कोई भी पार्टी अधिक विलंब नहीं करना चाहती, क्योंकि देरी का मतलब चुनाव प्रचार में पिछड़ जाना है और यह किसी पर भी भारी पड़ सकता है।
इसी तरह जनता के साथ ही हम भी इंतजार कर रहे हैं उपचुनाव की बिसात पर दौड़ने वाले घोड़ों का
ताकि अपने दर्शकों को बता सकें कि कौन, किस करवट बैठ रहा है और कौन, किस कोने से राजनीति की शतरंज पर चालें चल रहा है।
तब तक के लिए आपसे विदा लेते हैं, इस वायदे के साथ कि हिमाचल में विधानसभा उपचुनाव के समीकरण व समीक्षा लगातार आपसे साझा करते रहेंगे।
जयहिंद,,, जय हिमाचल,,,,,,,