Fri, November 27
सोलन
September 05,2019

एक राजपूत शासक जो बन गए लोक देवता

गुग्‍गा जाहरवीर को मानते हैं हिंदू-मुस्लिम, सिख,

राजस्‍थान, हरियाणा, हिमाचल सहित पूरे उत्‍तर भारत में है गुग्‍गाजी की मान्‍यता,

रविंद्र पंवर :

यूं तो संपूर्ण भारतवर्ष ही देवभूमि है, जिसमें कोटि-कोटि देवी-देवताओं का वास है और सबकी अपनी-अपनी मान्‍यता व महत्‍व। हालांकि यह सभी देवी-देवता स्‍थानीय स्‍तर पर पूजे जाते हैं और एक वर्ग, जाति अथवा धर्म विशेष के लोगों की ही उनमें आस्‍था रहती है। आज हम एक ऐसे शूरवीर राजपूत शासक की बात करेंगे, जो अपने जीवट, शौर्य व धर्मपरायणता सहित जनहिताय होने के कारण केवल हिंदू ही नहीं, मुस्लिम व सिखों के भी अराध्‍य बन गए।

यह हैं 11वीं शताब्‍दी में राजस्‍थान के प्रतापी राजा रहे गुग्‍गा जाहरवीर, जिन्‍हें आज विभिन्‍न धर्मों व संप्रदायों के लोग, खासकर हिंदू व मुस्‍लमान‍ बराबर आस्‍था के साथ पूजते हैं। चूंकि उस समय इनका राज्‍य राजस्‍थान से लेकर हरियाणा की सीमा तक था तो इनकी मान्‍यता भी दूर-दूर तक फैली, लेकिन सर्प विश के देवता माने जाने के कारण आज गुग्‍गा जाहरवीर की ख्‍याति राज्‍यों की सीमाओं को तोड़कर भारतवर्ष के विभिन्‍न प्रांतों में फैली हुई है। वैसे तो गुग्गाजी के संबंध में अनेक दंत कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन उनकी स्‍तुती में गाए जाने वाले गीतों से पता चलता है कि इनका जन्म विक्रम संवत 1003 के दौरान बीकानेर के ददरेड़ा नामक स्थान पर चौहान वंश के राजपूत शासक जैबर अथवा जेवर सिंह सिंह चौहान के घर हुआ था। उनकी माता बाच्छल के अलावा मौसी काच्छल भी इसी परिवार में ब्याही गई थी और दोनों बहनें संतानहीन थीं। उन्हीं दिनों संत गुरु गोरखनाथ इस क्षेत्र में प्रवास पर थे, जिन्‍होंने बाच्छल को सोमवृक्ष की जड़ें देते हुए उसके चूर्ण का सेवन करने को कहा। इससे बाच्छल को गुग्गा के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। माना जाता है कि इन जड़ों को जिस शिला पर पिसा गया था, वहां से बचे हुए चूर्ण को बाच्छल की तीन अन्य सखियों ने भी खा लिया और उन्हें भी एक-एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिनके नाम नरसिंह पांडे, भजनू व रतनू रखे गए। इसके अलावा कुछ चूर्ण बाच्छल की घोड़ी ने भी चाट लिया था और उसने भी एक नीले रंग के घोड़े को जन्म दिया। गुग्गा के मंदिरों में इन सभी की पूजा की जाती है और इनके समूह को पंचवीर कहा जाता है। कुछ दंतकथाओं में यह भी कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ ने बाछल को पाताल लोक से लाया हुआ गुग्‍गल दिया था और इसी के चलते उनके बेटे का नाम गुग्‍गा पड़ा।

लिहाजा गुग्‍गा जाहरवीर का पूरा जीवन साहस, समर्पण व समाजसेवा को समर्पित रहा, जिनके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। दंतकथाओं में यह भी कहा जाता है कि गोगाजी दिल्ली के सुल्तान से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्‍त हुए थे। कहीं-कहीं यह भी जिक्र मिलता है कि महमूद गजनवी ने जब 1018 के दौरान सोमनाथ पर आक्रमण किया था तो इस राजपूत शासक ने वापसी में उनका जमकर मुकाबला किया और अपने भाई-बांधवों के साथ शहादत प्राप्‍त की थी। उनके बारे में यह भी प्रचलित है कि वह मरने के बाद फिर से जीवीत हो उठे थे, एक घटनाक्रम के चलते वह अपने घोड़े के साथ ही जमीन में समा गए थे। राजस्‍थान के इसी स्‍थान पर बाद में गुग्‍गामाड़ी की स्‍थापना हुई, जहां हर वर्ष विशाल मेला लगता है। अन्‍य कथा के अनुसार धरती में समा जाने के बावजूद गोगा जी अपनी पत्नी सिरियल से मिलने आते थे। बाद में उनकी कीर्ति इतनी फैली और सर्प विश का निवारण करने के चलते वे जनता में अत्‍यंत लोकप्रिय व पूजनीय हो गए। विशेषतौर पर राजस्‍थान व हरियाणा से लेकर उत्‍तर भारत के राज्‍यों में इनका खासा महत्‍व है, जहां स्‍थान-स्‍थान पर इनके मंदिर बने हैं और गुग्‍गामाड़ी के नाम से हर वर्ष मेले लगते हैं, जबकि गांव-शहर में विशेष आयोजन किए जाते हैं। 

उधर, हिमाचल में गुग्‍गा जाहर वीर से जुड़ी एक और कहानी है, जिसमें उन्‍हें सिरमौर जिला के अराध्‍य देव शिर्गुल महाराज का परम मित्र माना जाता है। बताया जाता है कि अपने समय में महाशक्तिशाली रहे शिर्गुल महाराज दिल्‍ली में हाट लगाने अर्थात व्‍यापार करने जाते थे। इसी दौरान एक व्‍यापारी की हेराफेरी व चुगली के कारण उन्‍हें दिल्‍ली के सुल्‍तान ने बंदी बना लिया था। शिर्गुल महाराज अपनी शक्ति के बल पर वहां से भाग न निकले, इसलिए सुल्‍तान ने उनकी जेल को चमड़ों की रस्सियों से घेर दिया। ऐसे में महाराज ने एक महिला सफाई कर्मचारी के माध्‍यम से अपने मित्र बागड़ नरेश गुग्‍गाजी को संदेश भिजवाया। ऐसे में गुग्‍गा जाहरवीर दिल्‍ली आए और उन्‍हें मुस्लिम शासक की कैद से मुक्‍त करवाया। यही कारण है कि सिरमौर जनपद में भी बागड़ नरेश को पूरी श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। शिर्गुल महाराज के स्‍थान चूड़धार में भी अलग से एक शीला पर गुग्‍गा को पीर के तौर पर पूजा जाता है।

सुबाथू : इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश के विभिन्‍न जिलों में गुग्‍गा पीर के मंदिर व मड़ी स्‍थापित हैं, जहां विशेष आयोजन किए जाते हैं। लोग अपने दुख-दर्दों का निवारण करने गुग्‍गाजी के चेलों के पास आते हैं और ठीक होकर इनके गुणगान करते हैं। इसी कड़ी में सोलन जिला के सुबाथू में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीकात्‍मक तौर पर हर वर्ष गुग्गामाड़ी मेला मनाया जाता है। दशकों से यह मेला प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के 15 दिन बाद सेना के लोअर कैंप स्थित मैदान में लगता आ रहा है। मेले के इन चार दिनों गुग्गा जाहरवीर के मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु मन्नतें मांगने व मन्नतें पूरी होने के बाद शीश नवाने आते हैं। मेले में रात्रि के समय 'गुग्गा के गीत, नाटक व अन्य रंगारंग कार्यक्रमों के अलावा अंतिम दो दिन दंगल लोगों के विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। यहां गुग्गामाड़ी मंदिर की स्थापना के विषय में कहा जाता है कि लगभग 170 वर्ष पूर्व वाल्मिकी परिवार से संबंध रखने वाले छित्तर व गुज्जर नामक व्यक्तियों को सपने में एक अद्भुत शक्ति ने माड़ी की स्थापना करने को कहा था। गुग्गा के परम भक्त डींगा की इसमें अहम भूमिका रही, जिन्होंने एक काले बकरे के गले में लाल डोर बांध कर खुला छोड़ दिया। पूरे सुबाथू का भ्रमण करने के बाद जहां बकरे ने घुटने टेके, वहीं मड़ी को स्‍थापित किया गया। इसके बाद छित्तर व गुज्जर ने राजस्थान के हनुमानगढ़ की गुग्गामाड़ी से मिट्टी व ईंटें लाकर सुबाथू में माड़ी की आधारशिला रखी। धीरे-धीरे इस पवित्र स्थान में लोगों की आस्था व श्रद्धा बढ़ती गई और अब यहां गुग्गा जी का भव्य मंदिर स्थापित है। लिहाजा यहां मनाए जाने वाले मेले में धर्मनिरपेक्षता आदर्श है। हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रतीक गुग्गा की छड़ी में नीचे की ओर नारियल और शीर्ष पर विराजमान ताजिया इसका उदाहरण है। लोक मान्यता है कि गुग्गा जाहरवीर नवमी की रात को माड़ी में प्रकट होकर लोगों के दुखों का निवारण करते हैं। यहां पर गुग्गा वीर को सर्प देवता के रूप में पूजते हुए उनके भक्त गारड़ू तांत्रिक विधि से सर्पदंश का निवारण भी करते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि गुग्गा जी के आशीर्वाद के कारण ही सुबाथू या आसपास के क्षेत्र में सर्पदंश से आज तक किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई। आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगाजी की पूजा की जाती है। गोगाजी के प्रतीक के रूप में पत्थर या लकडी पर सर्प की आकृति बनाई जाती है। लोक धारणा है कि सर्प दंश से प्रभावित व्यक्ति को यदि गोगाजी की मेडी तक लाया जाये तो वह व्यक्ति सर्प विष से मुक्त हो जाता है। 

प्रदेश भर में गुग्‍गा जाहरवीर की एक और मान्‍यता है कि लोग उन्‍हें स्‍थानीय स्‍तर पर नई फसल आने पर भी पूजते हैं। क्षेत्र के किसान इस सीजन में मक्की की नई फसल को सर्वप्रथम गुग्गा जी के मंदिर में चढ़ाकर अपने घरों में धनधान्य की कामना करते हैं। यही नहीं प्रदेश के कई स्‍थानों पर खेतों में कार्य करते हुए भी गुग्‍गा स्‍तूति में गीत गाए जाते हैं और उनके पवित्र स्‍थानों पर आयोजन किए जाते हैं। पहाड़ों में गुग्‍गामाड़ी मेले से माह भर पहले ही गुग्‍गा की टोलियां उनके झंडे को लेकर गांव-शहर में गुग्‍गाजी के गीत गाते हुए और लोगों को आशीर्वाद देते हुए निकलती है। इनके झंडे के आगे शीश नवाकर व आशीश लेकर लोग अपने परिवार सहित खुद का कतार्थ समझते हैं। 

उधर, हिमाचल में गुग्‍गा जाहर वीर से जुड़ी एक और कहानी है, जिसमें उन्‍हें सिरमौर जिला के अराध्‍य देव शिर्गुल महाराज का परम मित्र माना जाता है। बताया जाता है कि अपने समय में महाशक्तिशाली रहे शिर्गुल महाराज दिल्‍ली में हाट लगाने अर्थात व्‍यापार करने जाते थे। इसी दौरान एक व्‍यापारी की हेराफेरी व चुगली के कारण उन्‍हें दिल्‍ली के सुल्‍तान ने बंदी बना लिया था। शिर्गुल महाराज अपनी शक्ति के बल पर वहां से भाग न निकले, इसलिए सुल्‍तान ने उनकी जेल को चमड़ों की रस्सियों से घेर दिया। ऐसे में महाराज ने एक महिला सफाई कर्मचारी के माध्‍यम से अपने मित्र बागड़ नरेश गुग्‍गाजी को संदेश भिजवाया। ऐसे में गुग्‍गा जाहरवीर दिल्‍ली आए और उन्‍हें मुस्लिम शासक की कैद से मुक्‍त करवाया। यही कारण है कि सिरमौर जनपद में भी बागड़ नरेश को पूरी श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। शिर्गुल महाराज के स्‍थान चूड़धार में भी अलग से एक शीला पर गुग्‍गा को पीर के तौर पर पूजा जाता है।

 

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